– डॉ. मयंक चतुर्वेदी
भाेपाल, 30 अगस्त (Udaipur Kiran) । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल की जापान यात्रा ने भारत–जापान संबंधों में एक नया अध्याय खोला है। इसे केवल एक औपचारिक कूटनीतिक घटना कहना भूल होगी, क्योंकि इस यात्रा से निकले फैसले और समझौते आने वाले दशकों तक भारत की आर्थिक, तकनीकी, सामरिक और सांस्कृतिक दिशा तय करने वाले हैं। जापान दुनिया की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, जबकि भारत प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज गति से बढ़ती चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। इन दोनों एशियाई लोकतंत्रों का इस निर्णायक दौर में एक साथ आना न केवल उनके लिए बल्कि व्यापक वैश्विक समुदाय के लिए भी महत्वपूर्ण है।
इस यात्रा का सबसे उल्लेखनीय परिणाम व्यापक मानव संसाधन आदान-प्रदान योजना रहा। दोनों देशों ने अगले पाँच वर्षों में पाँच लाख से अधिक लोगों के आदान-प्रदान का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया, जिनमें से पचास हजार कुशल भारतीय पेशेवर और विद्यार्थी जापान जाएंगे। यह आँकड़ा केवल संख्या भर नहीं है; यह भारत के युवाओं के लिए वैश्विक अवसरों के खुलने का प्रतीक है। जापान वृद्ध होती जनसंख्या और श्रमिकों की कमी से जूझ रहा है, जबकि भारत के पास विशाल युवा जनसंख्या है, जिनमें से कई इंजीनियरिंग, प्रौद्योगिकी और सेवाओं में प्रशिक्षित हैं। इस असंतुलन को अवसर के रूप में पहचानकर दोनों देशों ने एक ऐसा मार्ग खोला है, जिससे भारतीय युवा सीधे जापान की अर्थव्यवस्था में योगदान दे सकेंगे और साथ ही वैश्विक अनुभव, कौशल और आय अर्जित करेंगे।
दूसरी बड़ी घोषणा निवेश प्रतिबद्धता के रूप में आई। जापान ने आश्वासन दिया है कि आने वाले दशक में उसका निजी क्षेत्र भारत में लगभग 10 ट्रिलियन येन-लगभग 68 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश करेगा। यह प्रतिबद्धता अब तक भारत में जापानी निवेश के स्तर से कहीं अधिक है। और भी महत्वपूर्ण यह है कि यह निवेश उन क्षेत्रों पर केंद्रित होगा जो भारत की भविष्य की वृद्धि के केंद्र में हैं; सेमीकंडक्टर निर्माण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वच्छ ऊर्जा, उच्च-तकनीकी निर्माण और मोबिलिटी। यहां प्रधानमंत्री मोदी ने सही कहा कि जापान की तकनीकी ताकतें और भारत का प्रतिभाशाली जनसमूह इस सदी की अगली तकनीकी क्रांति का नेतृत्व कर सकते हैं। भारत के पास जनसांख्यिकीय लाभ और बड़ा घरेलू बाजार है, जबकि जापान के पास पूंजी, विशेषज्ञता और उन्नत औद्योगिक क्षमताएँ हैं। इन ताकतों का संयोजन एशिया में औद्योगिक परिवर्तन के एक नए युग की नींव रख सकता है।
यह यात्रा केवल व्यापार और निवेश तक सीमित नहीं थी। एक अन्य महत्वपूर्ण विकास रहा “आर्थिक सुरक्षा पहल” का शुभारंभ, जिसका उद्देश्य आपूर्ति शृंखला की मजबूती और रणनीतिक क्षेत्रों में किसी एक स्रोत पर निर्भरता को कम करना है। हाल की वैश्विक आपूर्ति शृंखला की बाधाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी एक देश पर अधिक निर्भरता कितनी खतरनाक हो सकती है। इस पहल के अंतर्गत भारत और जापान पाँच महत्वपूर्ण क्षेत्रों; सेमीकंडक्टर, दुर्लभ खनिज, औषधि, स्वच्छ ऊर्जा और सूचना प्रौद्योगिकी में नजदीकी सहयोग करेंगे। यह न केवल भारत की आत्मनिर्भरता की यात्रा को मजबूत करेगा बल्कि जापान को भी चीन से अलग एक विश्वसनीय साझेदार देगा। ऐसे दौर में जब आर्थिक सुरक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा से अलग नहीं है, यह पहल गहरी सामरिक अहमियत रखती है।
अंतरिक्ष सहयोग को भी चर्चाओं में प्रमुख स्थान मिला। भारत की इसरो और जापान की जाक्सा ने चंद्रयान-5 मिशन पर सहयोग करने पर सहमति जताई, जो चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र में जल और बर्फ के संकेतों का अध्ययन करेगा। यह मिशन केवल विज्ञान का विषय नहीं है; यह भारत और जापान को भविष्य की वैश्विक अंतरिक्ष प्रतिस्पर्धा और संसाधन उपयोग की दौड़ में गंभीर खिलाड़ी के रूप में स्थापित करता है। यह भारत को उन्नत तकनीक तक पहुँच देगा और संयुक्त वैज्ञानिक शोध के अवसर प्रदान करेगा, जिससे एशिया की सामूहिक पहचान भी अंतरिक्ष में मजबूत होगी।
यात्रा ने शैक्षणिक और सांस्कृतिक संबंधों को भी गहराया। जापान में भारतीय विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं के अवसरों का दायरा अब और बड़ा हो गया है। जापानी सरकारी छात्रवृत्तियाँ, सकुरा साइंस एक्सचेंज प्रोग्राम, मिराई-सेतु पहल और लोटस कार्यक्रम भारतीय युवाओं को जापानी विश्वविद्यालयों में उन्नत अध्ययन करने और अत्याधुनिक शोध में सहयोग करने देंगे। साथ ही जापानी कंपनियों में भारतीय स्नातकों के लिए इंटर्नशिप और रोजगार के अवसरों को सरल बनाया जा रहा है। भाषा की बाधा को दूर करने के लिए भारत में जापानी भाषा शिक्षा के विस्तार पर विशेष ध्यान दिया गया है। अधिक भाषा प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए जाएंगे और जापानी कंपनियाँ भारतीय युवाओं की भाषा शिक्षा को आर्थिक सहायता देंगी। निहोंगो पार्टनर्स प्रोग्राम जैसी पहलकदमियाँ सांस्कृतिक आदान-प्रदान को जमीनी स्तर तक ले जाएँगी।
कौशल विकास भी एक प्रमुख क्षेत्र बनकर उभरा। जापानी कंपनियाँ भारत में प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करेंगी ताकि “जापान-तैयार कार्यबल” तैयार किया जा सके। इंडिया–जापान टैलेंट ब्रिज और इनपैक्ट जैसी योजनाएँ भारतीय युवाओं को जापान में रोज़गार और इंटर्नशिप के अवसरों से जोड़ेंगी। विशेष रूप से बुजुर्गों की देखभाल पर जोर दिया जा रहा है, यह ऐसा क्षेत्र है जहाँ जापान के पास उत्कृष्ट विशेषज्ञता है लेकिन श्रमिकों की भारी कमी है। भारत की मानव शक्ति और जापान की विशेष प्रणालियों के साथ यह क्षेत्र नए रोजगार के अवसर पैदा कर सकता है। इसके साथ ही जापान में योग और आयुर्वेद के उत्कृष्टता केंद्र भी स्थापित किए जा रहे हैं, जो भारत की सॉफ्ट पावर को मजबूती देंगे और साझेदारी में सांस्कृतिक आयाम जोड़ेंगे।
राज्य–प्रान्त सहयोग को भी प्रोत्साहित किया गया है, ताकि साझेदारी केवल राष्ट्रीय स्तर तक सीमित न रहे। आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और गुजरात जैसे राज्य जापान के तोयामा, एहिमे, यामानाशी और शिजुओका प्रान्तों के साथ भागीदारी कर रहे हैं। इस तरह का उप-राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग स्थानीय निवेश को बढ़ावा देगा, क्षेत्रीय अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत करेगा और लोगों के बीच संपर्क को बढ़ाएगा।
रणनीतिक रूप से भी इस यात्रा के महत्वपूर्ण परिणाम रहे। भारत और जापान ने स्वतंत्र, खुला और नियम-आधारित इंडो-पैसिफिक के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। चीन की विस्तारवादी नीतियों की पृष्ठभूमि में यह संयुक्त रुख अत्यंत महत्वपूर्ण है। क्वाड समूह के सदस्य होने के नाते भारत और जापान मानते हैं कि क्षेत्रीय शांति और स्थिरता अंतरराष्ट्रीय मानकों और समुद्रों में स्वतंत्र नौवहन पर निर्भर करती है। प्रधानमंत्री मोदी और प्रधानमंत्री शिगेरू इशिबा की चर्चाओं ने साझा चुनौतियों के सामने मज़बूत समुद्री सहयोग और अधिक रणनीतिक समन्वय की आवश्यकता पर जोर दिया।
यात्रा के दौरान रक्षा उद्योग, डिजिटल अर्थव्यवस्था, नवाचार, आर्थिक सुरक्षा और मानव संसाधन विकास जैसे क्षेत्रों में कुल 12 समझौते हुए। इसके अतिरिक्त, दोनों देशों ने अगले दशक के लिए एक “संयुक्त दृष्टि” अपनाई, जिसमें आठ प्रमुख सहयोगी क्षेत्र पहचाने गए; अगली पीढ़ी की आर्थिक साझेदारी, तकनीक और नवाचार, पर्यावरणीय स्थिरता, स्वास्थ्य सेवा, जन–से–जन आदान-प्रदान, मोबिलिटी और राज्य–प्रान्त स्तर पर सहयोग। यह दृष्टि दस्तावेज स्पष्ट करता है कि भारत–जापान साझेदारी अब केवल द्विपक्षीय व्यापार या निवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी में बदल रही है।
इस यात्रा का समय भी उल्लेखनीय है। आज की दुनिया भू-राजनीतिक तनावों और आर्थिक अनिश्चितता से भरी हुई है। अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध, एशिया-प्रशांत में तनाव और तकनीकी वर्चस्व की होड़ ने देशों को अपनी रणनीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया है। ऐसे परिदृश्य में भारत और जापान का साथ आना न केवल उनके लिए बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए स्थिरता का कारक है। अपने हितों को संरेखित करके और अपनी ताकतों को मिलाकर, भारत और जापान इंडो-पैसिफिक में स्थिरता के आनेवाले समय में प्रभावी स्तंभ और विकास के इंजन बन सकते हैं।
अंत में कहना यही होगा कि भारत के लिए यह केवल एक सफल कूटनीतिक दौरा नहीं था; यह एक वैश्विक खिलाड़ी के रूप में अपनी भूमिका गढ़ने की दिशा में ऐतिहासिक कदम था। टोक्यो से संदेश स्पष्ट है- भारत और जापान केवल मित्र ही नहीं, बल्कि एशिया और दुनिया के भविष्य को गढ़ने वाले साझेदार हैं।
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(Udaipur Kiran) / डॉ. मयंक चतुर्वेदी
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