इस्लामाबाद: फील्ड मार्शल सैम होर्मुसजी फ्रामजी जमशेदजी मानेकशॉ भारतीय सैन्य इतिहास की सबसे अहम शख्सियतों में से एक हैं। साल 1914 में जन्में और 2008 में दुनिया छोड़ गए सेना के इस लीडेंज को सैम मानेकशॉ और सैम बहादुर के नाम से देश और दुनिया में याद किया जाता है। सैम मानेकशॉ की आज (3 अप्रैल) जयंती है। भारतीय सेना ने उनकी जंयती पर बयान जारी करते हुए कहा है कि मानेकशॉ भारतीय सेना के 8वें सीओएएस और पहले फील्ड मार्शल थे। वे 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में भारत की जीत के सूत्रधार थे। भारतीय सेना सैम बहादुर को उनकी 111वीं जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित करती है।मानकेशॉ ने 40 साल से ज्यादा के सैन्य करियर में पांच बड़े युद्धों में हिस्सा लिया। इसमें दूसरा विश्वयुद्ध भी शामिल है और 1971 की भारत-पाकिस्तान की लड़ाई भी, जिसके नतीजे में बांग्लादेश वजूद में आया। दिलचस्प बात ये है कि 1971 में पाकिस्तान को घुटने टेकने पर मजबूर करने वाले मानेकशॉ के पास पाक आर्मी ज्वाइन करने का भी मौका था। मोहम्मद अली जिन्ना ने खुद मानेकशॉ से पाकिस्तान की सेना में शामिल होने का अनुरोध किया था लेकिन उन्होंने भारत में रहने का फैसला किया। भारत विभाजन के समय मेजर थे मानेकशॉभारत का विभाजन हुआ तो ब्रिटिश इंडियन आर्मी भी दोनों देशों में विभाजित हुई। ब्रिटिश आर्मी में 1947 में करीब 4,00,000 सैनिक थे। भारत को 2,60,000 सैनिक मिले और बाकी पाकिस्तान को दिए गए। सैनिकों को यह चुनने का अधिकार नहीं था कि वे किस सेना में शामिल होंगे लेकिन अधिकारियों के लिए ऐसा नहीं था। अफसरों को किसी एक देश की आर्मी को चुनने का हक था।सैम मानेकशॉ भारत विभाजन के समय मेजर थे। मानेकशॉ एक पारसी थे और उनका जन्म अमृतसर में हुआ था। हालांकि उनका परिवार मूल रूप से मुंबई का रहने वाला था। भारत विभाजन के समय उनकी मूल यूनिट 12वीं फ्रंटियर फोर्स रेजिमेंट पाकिस्तानी सेना का हिस्सा बनी। ऐसे में मानेकशॉ के सामने यह विकल्प था कि वे किस देश की सेना में शामिल हों। ऐसे में उनके पास जिन्ना का ऑफर आया। जिन्ना का प्रस्ताव ठुकरायापाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना ने खुद मानेकशॉ से पाकिस्तानी सेना में शामिल होने का अनुरोध किया। कर्नल तेजा सिंह औलख (जो उस समय मेजर थे) ने हनादी फाल्की की फील्ड मार्शल मानेकशॉ की जीवनी में बताया है कि मानेकशॉ को पाकिस्तान में तेजी से तरक्की मिलने को भरोसा भी दिया गया था। इसके बावजूद उन्होंने जिन्ना का ऑफर ठुकराया और भारत में रहना पसंद किया।इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, रिटायर होने के कई वर्ष बाद फील्ड मार्शल मानेकशॉ से 1947 में लिए गए उनके फैसले के बारे में पूछा गया था। इस पर उन्होंने मजाक में जवाब दिया था, 'जिन्ना ने मुझसे 1947 में पाकिस्तानी सेना में शामिल होने के लिए कहा था। अगर मैं ऐसा कर लेता तो 1971 में भारत हार जाता।' ऐसा होता तो बांग्लादेश शायद कभी नहीं बन पाता।
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