स्टूडेंट्स के प्रोफेशनल डेवलपमेंट को हायर एजुकेशन से जोड़ने के उद्देश्य से, अथॉरिटीज ने प्राइवेट सेक्टर को टेक्नोलॉजी, मैनेजमेंट और इंडस्ट्री से जुड़े अन्य सेक्टरों और उनमें प्रोफेशनल हायर एजुकेशन देने के लिए बनाया है। सीधे शब्दों में कहें तो, MBA को यूनिवर्सिटी चलाती है। इसलिए उसका सिलेबस यूनिवर्सिटी के नियमों के हिसाब से बनता है। वहीं, PGDM को प्राइवेट इंस्टिट्यूट चलाते हैं, इसलिए उन्हें इंडस्ट्री की जरूरतों के हिसाब से सिलेबस बनाने की ज्यादा आजादी होती है।
PGDM भारत में कैसे और क्यों शुरू हुआ?

GNIOT इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज के डायरेक्टर डॉ भूपेंद्र कुमार सोम बताते हैं कि 'यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) एक्ट, 1956 के तहत पोस्ट-ग्रेजुएट डिग्री देने के लिए यूनिवर्सिटी स्थापित की जा सकती हैं। इसके लिए कुछ बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होती है। लेकिन बहुत से प्राइवेट सेक्टर ऑर्गेनाइजेशन्स के पास सरकार के विजन के मुताबिक प्राइवेट प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के लिए पर्याप्त बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं था। समस्या का समाधान करते हुए, AICTE ने स्टैंडअलोन मैनेजमेंट इंस्टिट्यूट्स को मान्यता देना शुरू किया। ये संस्थान एआईसीटीई की गाइडलाइंस और अप्रूवल के तहत PGDM कोर्सेस देने लगे। (फोटो- Freepik)
MBA और PGDM में अंतर

इन PGDM कोर्सेज को एसोसिएशन ऑफ इंडियन यूनिवर्सिटीज (AIU) द्वारा MBA के बराबर मान्यता दी गई है। टेक्निकल डिफरेंस के अलावा, पीजीडीएम और एमबीए प्रोग्राम अपने करिकुलम डिजाइन, फ्लेक्सिबिलिटी, इंडस्ट्री रेलेवेंस, करियर डेवलपमेंट और ग्लोबल रिकॉग्निशन में अलग होते हैं। PGDM प्रोग्राम को मिली आजादी इसे इंडस्ट्री की जरूरतों और तेजी से बदलते बिजनेस इकोसिस्टम के अनुकूल बनाती है। 5 बड़े अंतर आगे बताए गए हैं। (फोटो- ChatGPT)
MBA Vs PGDM: करिकुलम में अंतर
पीजीडीएम करिकुलम को एमबीए प्रोग्राम की तुलना में ज्यादा आजादी होती है। PGDM प्रोग्राम के करिकुलम डिजाइन के अलग अलग पहलू है। जैसे- सिलेबस को कितनी जल्दी-जल्दी अपडेट किया जाता है। आजकल PGDM का सिलेबस आजकल हर साल अपडेट होता है। जबकि MBA में सिलेबस अपडेट करने की स्पीड इंडस्ट्री में हो रहे बदलावों की तुलना में धीमी है। इसलिए, पीजीडीएम का सिलेबस न केवल स्टूडेंट्स को इंडस्ट्री की करंट जरूरतों के लिए तैयार करता है, बल्कि भविष्य की इंडस्ट्री की जरूरतों के लिए भी ट्रेन करता है। हर साल अपडेट होने से एआई, मशीन लर्निंग, डेटा बेस्ड फैसले लेने के टूल्स जैसी लेटेस्ट इंडस्ट्री की जरूरतों को शामिल किया जाता है। (फोटो- Freepik)
एमबीए Vs पीजीडीएम: कोर्स डिजाइन

PGDM कोर्स की फ्लेक्सिबिलिटी इसके पूरे डिजाइन स्ट्रक्चर में दिखाई देती है। इसका एक उदाहरण है कि पीजीडीएम में ट्राइमेस्टर सिस्टम होता है। इससे छात्रों को सीखने के लिए कई तरह के कोर्स मिलते हैं। एक छात्र को 8-10 सप्ताह के छह अलग-अलग टर्म्स में 40-45 कोर्स पढ़ने को मिलते हैं। वहीं, MBA में एक छात्र को चार अलग-अलग सेमेस्टर में 30-35 मैनेजमेंट कोर्स पढ़ने को मिलते हैं। (फोटो- Freepik)
MBA और PGDM: असेसमेंट प्रॉसेस
PGDM मे असेसमेंट की प्रक्रिया भी फ्लेक्सिबल होती है। कोर्स की जरूरतों के हिसाब से लगातार और एंड टर्म इवैल्यूएशन तय करने की ज्यादा आजादी होती है। उदाहरण के लिए- फाइनेंशियल मॉडलिंग और मार्केटिंग एनालिटिक्स जैसे प्रैक्टिकल कोर्सेज का लैब बेस्ड असेसमेंट किया जा जाता है। (फोटो- Freepik)एजुकेशन न्यूज टुडे: पढ़ने-लिखने वाली चीजों पर नहीं लगेगा GST?
MBA and PGDM: इंडस्ट्री रेलिवेंस, टीचिंग लर्निंग मेथड
पीजीडीएम में सिलेबस को पढ़ाने के लिए एकेडमिक और कॉर्पोरेट ट्रेनर्स दोनों का योगदान लिया जाता है। एकेडेमिक ट्रेनर कॉन्सेप्चुअल फाउंडेशन (बेसिक कॉन्सेप्ट) बनाते हैं, और कॉर्पोरेट ट्रेनर (इंडस्ट्री के लोग) उस पर काम करने लायक नॉलेज का स्ट्रक्चर तैयार करते हैं। PGDM में रेगुलर सिलेबस के अलावा कई और चीजें भी पढ़ाई जाती हैं। जैसे- अलग-अलग कंपनियों के सर्टिफिकेशन कोर्स। इंडस्ट्री ट्रेनिंग प्रोग्राम क्रेडिट बेस्ड होते हैं। मतलब इन्हें करने पर आपको एक्स्ट्रा नंबर मिलते हैं। (फोटो- Freepik)Study Abroad: विदेश में पढ़ने के लिए बस इंग्लिश आना काफी नहीं, पास करने होंगे ये एग्जाम्स!
ग्लोबल इंटीग्रेशन

PGDM की एक और खास बात है इसका ग्लोबल इंटीग्रेशन। इस प्रोग्राम के जरिए स्टूडेंट्स को ग्लोबल बिजनेस एनवायरमेंट की समझ मिलती है। कुछ PGDM प्रोग्राम विदेशी यूनिवर्सिटीज के साथ मिलकर डुअल डिप्लोमा भी देते हैं। ये ग्लोबल प्रोग्राम स्टूडेंट्स को इंटरनेशनल बिजनेस एनवायरमेंट में मुकाबला करने के लिए तैयार करते हैं। आसान शब्दों में कहें तो, पीजीडीएम स्टूडेंट्स को ज्यादा डायनेमिक, प्रैक्टिकल लर्निंग, ज्यादा एक्सपोजर, नए तरीके से सीखने-सिखाने की टेक्नीक और ओवरऑल डेवलपमेंट देता है। नौकरी के मौके और सैलरी भी बेहतर मिलने की संभावना रहती है। (फोटो- Freepik)
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