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कहां गई संवेदनशीलता

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यौन उत्पीड़न से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट को फिर से दखल देना पड़ा और इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगानी पड़ी। यह जितना राहत भरा है, उतना ही चिंताजनक भी। देश की शीर्ष अदालत का हाईकोर्ट के जज को नसीहत देना बताता है कि महिलाओं को लेकर समाज में जितनी संवेदनशीलता होनी चाहिए थी, उतनी है नहीं। अपमानजनक टिप्पणीइलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले में फैसला सुनाते हुए कहा था कि नाबालिग के प्राइवेट पार्ट को छूना और सलवार का नाड़ा खींचना रेप की कोशिश नहीं है। यह टिप्पणी उन महिलाओं को हतोत्साहित करने और उनका मखौल उड़ाने जैसी थी, जो यौन उत्पीड़न जैसे अपराध की शिकार हैं और न्याय पाने के लिए संघर्ष कर रही हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से उन्हें हिम्मत मिली होगी कि न्याय का पलड़ा उनके पक्ष में है। गलती सुधारी अदालती फैसले केवल कठघरे तक सीमित नहीं रहते। इनका असर व्यापक समाज पर पड़ता है। इससे भविष्य में अपराधियों को दंड और पीड़ित को न्याय दिलाने में मदद मिलती है। दुर्भाग्य से मौजूदा मामले की एक टिप्पणी अगर कायम रहती, तो आगे चलकर रेप से जुड़े मामलों में महिलाओं को इंसाफ दिलाना मुश्किल हो सकता था। हाईकोर्ट के फैसले में कहा गया था कि अपराध की तैयारी और उसके प्रयास में मुख्य अंतर केवल इरादे की मजबूती का होता है। गनीमत है कि सुप्रीम कोर्ट ने इसे भी गलत बताया। सावधानी क्यों नहींशीर्ष अदालत ने गलतियों को सुधारने की कोशिश की है, लेकिन सवाल है कि ऐसी नौबत आती ही क्यों है? यौन उत्पीड़न से जुड़े केस में तो खास संवेदनशीलता और पीड़िता पर पड़ने वाले भावनात्मक असर का ख्याल रखा जाना चाहिए। हर एक शब्द नाप-तौल कर इस्तेमाल होना चाहिए। लेकिन, ऐसा क्यों नहीं हो रहा? पिछले साल कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक टिप्पणी में कहा था कि लड़कियों को अपनी यौन इच्छाओं पर काबू रखना चाहिए और तब भी सुप्रीम कोर्ट ने दखल देते हुए इसे आपत्तिजनक बताया था। फिर पिछले साल ही सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट को याद दिलाया कि बलात्कार के आरोपी को पीड़िता या उसके माता-पिता या संरक्षक की बात सुने बिना जमानत नहीं दी जानी चाहिए। समर्थन चाहिएमहिलाओं के लिए न्याय की लड़ाई अब भी बहुत कठिन है। उन्हें अत्याचार करने वाले का तो सामना करना ही पड़ता है, कई बार खुद के परिवार और समाज से भी भिड़ना पड़ता है। हर कदम पर उन्हें इज्जत की दुहाई मिलती है। यह सब झेलते हुए जब वह अदालत पहुंचती हैं, तो बार-बार बीती बातों को याद दिलाया जाता है। इस संघर्ष में उन्हें न्यायपालिका का साथ चाहिए, ऐसी टिप्पणियां और दकियानूसी नसीहतें नहीं, जो उनकी मुश्किलों को और बढ़ा दें।
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