प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को अपनी नागपुर यात्रा के दौरान हालांकि कई कार्यक्रमों में शिरकत की, लेकिन इस दौरे का सबसे खास पहलू था उनका संघ मुख्यालय जाना। नरेंद्र मोदी बतौर प्रधानमंत्री कभी वहां नहीं गए थे। उनसे पहले संघ मुख्यालय जाने वाले एकमात्र प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी रहे। समर्पण के बावजूद: वैसे तो पीएम मोदी संघ प्रचारक रहे हैं, संघ की सोच और उसके अजेंडा को लेकर उनका समर्पण संदेहों से परे रहा है, फिर भी कई वजहों से केंद्र सरकार और संघ के बीच रिश्तों में कथित रूप से थोड़ी असहजता देखी जा रही थी। पिछले साल बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने लोकसभा चुनावों से पहले कहा था कि पार्टी अब इतनी समर्थ हो गई है कि उसे संघ के सहारे की जरूरत नहीं। इस बयान को भी दोनों के रिश्तों में असहजता से जोड़कर देखा गया। उदासीनता का नतीजा: खैर, औपचारिक तौर पर संघ की कोई बीजेपी अध्यक्ष के इस बयान पर प्रतिक्रिया नहीं आई, लेकिन जब लोकसभा चुनावों में बीजेपी 'अबकी बार चार सौ पार' के दावों के बीच अपने दम पर बहुमत भी हासिल नहीं कर पाई तो माना गया कि संघ की कथित नाराजगी से उपजी उदासीनता की इसमें बड़ी भूमिका रही। इसके बाद दोनों तरफ से गलतफहमियां दूर करने की कोशिशों का नतीजा हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में बीजेपी को मिली अप्रत्याशित सफलता को माना गया। अब पीएम मोदी की इस यात्रा ने रहा-सहा संदेह भी दूर करने का काम किया है। सहमति के संकेत: आरएसएस से बीजेपी के रिश्तों के संदर्भ से अलग हटकर देखें तो भारतीय राजनीति को प्रभावित करने वाले कुछ और अहम सवाल भी इस यात्रा से जोड़े जाते रहे हैं। ऐसा ही एक सवाल अगले पार्टी अध्यक्ष के नाम पर सहमति बनने का है। माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह यात्रा पार्टी और सरकार के भविष्य के लिहाज से अहम माने जाने वाले ऐसे कई मसलों पर फैसलों में तेजी लाएगी। आगे की राह: पीएम मोदी की अगुआई में हिंदुत्व की राजनीति ने अपना जैसा विस्तार किया है, उसके मद्देनजर यह सवाल भी बहुतों के मन में उठने लगा है कि इस राजनीति के अगले चरण का नेतृत्व कौन करेगा। हालांकि बीजेपी यह स्पष्ट कर चुकी है कि सरकार के मौजूदा कार्यकाल में किसी तरह के बदलाव का सवाल ही नहीं उठता, फिर भी संघ प्रमुख और पीएम मोदी की यह करीबी इस बात का संकेत है कि भविष्य की दिशा तय करने का काम अब ज्यादा सहजता और सामंजस्य के साथ होगा।
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