रेसिप्रोकल टैरिफ एक ऐसी व्यापार नीति है, जिसे अंतरराष्ट्रीय व्यापार में समानता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए लागू किया जाता है। हाल के वर्षों में यह शब्द वैश्विक चर्चा का केंद्र बन गया है, खासकर जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनावी प्रचार और नीतियों में इसे जोर-शोर से अपनाया। अब ट्रंप प्रशासन ने भारत समेत कई देशों पर इस नीति के तहत आयात शुल्क बढ़ा दिए हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार में नए समीकरण बनने लगे हैं।
रेसिप्रोकल टैरिफ क्या है?
टैरिफ एक प्रकार का शुल्क या कर है, जिसे किसी देश द्वारा आयातित या निर्यातित वस्तुओं पर लगाया जाता है। इसे सरकारें व्यापार नीति और राजस्व संग्रह के एक साधन के रूप में इस्तेमाल करती हैं। 'रेसिप्रोकल' शब्द का अर्थ होता है 'पारस्परिक' या 'जवाबी'। इस प्रकार, रेसिप्रोकल टैरिफ का मतलब है कि अगर एक देश किसी अन्य देश के सामान पर टैरिफ लगाता है, तो दूसरा देश भी उसी अनुपात में उस पर टैरिफ लगा सकता है। उदाहरण के लिए, यदि भारत अमेरिका से आयातित वस्तुओं पर 20% टैरिफ लगाता है, तो अमेरिका भी भारतीय उत्पादों पर 20% टैरिफ लगा सकता है। इस नीति का उद्देश्य व्यापार संतुलन बनाए रखना और घरेलू उद्योगों को संरक्षण देना है। यह विशेष रूप से उन देशों के लिए महत्वपूर्ण है, जो अपने व्यापार घाटे को कम करने का प्रयास कर रहे हैं। अमेरिका, जो लंबे समय से व्यापार घाटे का सामना कर रहा है, इस नीति को एक प्रभावी हथियार के रूप में देखता है।
ट्रंप ने जवाबी टैरिफ को बनाया आर्थिक हथियार
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जवाबी टैरिफ (Reciprocal Tariff) को एक प्रभावी आर्थिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया, जिसका उद्देश्य अमेरिका के व्यापार घाटे को कम करना और अन्य देशों को अमेरिकी उत्पादों पर ऊंचे टैरिफ लगाने से रोकना था। उन्होंने इसे "फेयर ट्रेड" (निष्पक्ष व्यापार) के सिद्धांत के तहत लागू किया, जिसमें स्पष्ट किया कि यदि कोई देश अमेरिकी सामानों पर अधिक शुल्क लगाता है, तो अमेरिका भी उसके आयातित उत्पादों पर समान टैरिफ लगाएगा। ट्रंप प्रशासन ने इस नीति को अपने "लिबरेशन डे" अभियान के तहत आर्थिक दबाव बनाने के लिए उपयोग किया, विशेष रूप से भारत जैसे देशों पर, जहां उन्होंने 26% टैरिफ की घोषणा की। इस कदम से वैश्विक व्यापारिक तनाव बढ़ गया और कई देशों ने विरोध जताया।
जवाबी टैरिफ के फायदे
घरेलू उद्योगों की सुरक्षा – यह नीति स्थानीय निर्माताओं को सस्ते विदेशी उत्पादों से प्रतिस्पर्धा करने में मदद करती है।
व्यापार घाटे में कमी – समान टैरिफ से आयात और निर्यात के बीच संतुलन बना रह सकता है।
निष्पक्ष व्यापार सुनिश्चित करना – यह रोकता है कि कोई भी देश अनुचित व्यापारिक लाभ न उठा सके।
संभावित नुकसान
महंगाई में वृद्धि – जवाबी टैरिफ से उपभोक्ताओं को महंगे उत्पादों का सामना करना पड़ सकता है।
व्यापार युद्ध की आशंका – कई देशों के बीच व्यापारिक तनाव बढ़ सकता है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
जवाबी टैरिफ का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
जवाबी टैरिफ (Reciprocal Tariff) का विचार नया नहीं है। इसका इतिहास 19वीं सदी तक जाता है, जब 1860 में ब्रिटेन और फ्रांस के बीच कोबडेन-शेवेलियर संधि हुई थी। इस संधि ने दोनों देशों के बीच टैरिफ में कटौती की और व्यापार को बढ़ावा दिया। बाद में, 1934 में अमेरिका ने "रेसिप्रोकल टैरिफ एक्ट" पारित किया, जिसने अमेरिकी राष्ट्रपति को अन्य देशों के साथ टैरिफ समझौतों को लागू करने की शक्ति दी। 1934 से 1945 के बीच, अमेरिका ने 27 देशों के साथ 32 व्यापार समझौते किए। डोनाल्ड ट्रंप ने इस नीति को फिर से चर्चा में लाया, विशेष रूप से अपनी "अमेरिका फर्स्ट" नीति के तहत, जहां उन्होंने जवाबी टैरिफ को एक व्यापारिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया।
जवाबी टैरिफ: वैश्विक व्यापार में चर्चा का विषय
वर्तमान में जवाबी टैरिफ फिर से चर्चा में है। डोनाल्ड ट्रंप ने 2 अप्रैल 2025 से इसे लागू करने की घोषणा की। इस नीति के तहत अमेरिका उन देशों पर टैरिफ बढ़ा रहा है जो अमेरिकी उत्पादों पर ऊंचे शुल्क लगाते हैं।
किन देशों पर पड़ेगा प्रभाव?
भारत – अमेरिकी वाहनों और अन्य उत्पादों पर 100% से अधिक टैरिफ लगाने के कारण निशाने पर
चीन – अमेरिकी तकनीकी और औद्योगिक उत्पादों पर ऊंचे शुल्क की वजह से विवाद
ब्राजील – कृषि और औद्योगिक उत्पादों को लेकर व्यापार असंतुलन
यूरोपीय संघ – अमेरिकी निर्यात पर भारी शुल्क लगाने के कारण संभावित टकराव
भारत पर जवाबी टैरिफ का प्रभाव
ट्रंप ने भारत का विशेष रूप से उल्लेख किया और कहा कि भारत अमेरिकी वाहनों पर 100% से अधिक टैरिफ लगाता है। इसके जवाब में, अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर 26% जवाबी टैरिफ लगाने की घोषणा की। इससे ऑटोमोबाइल, टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल्स और रत्न-आभूषण जैसे क्षेत्रों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि भारत के निर्यात में 2 से 7 बिलियन डॉलर तक की गिरावट आ सकती है।
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